Pomegranate Farming /किसान यह बागवानी कर कमा सकते हैं लाखों रुपए

अनार की बागवानी कैसे करें

नमस्ते दोस्तों

भारत में अनार की खेती मुख्य रूप में महाराष्ट्र में की जाती है राजस्थान उत्तर प्रदेश आंध्र प्रदेश हरियाणा पंजाब कर्नाटक और गुजरात में छोटे लेवल पर इस के बगीचे देखने को मिल जाएंगे अनार की खेती करके आप साल में 9 से 10 लाख तक की कमाई कर सकते हैं अनार की बागबानी से किसान अछि आमदनी प्राप्त कर सकते है कम समय और कम पेसो में ज्यादा कमाइ का सपना हर किसान का होता है पहली नजर में किसानो के लिए ऐसा मुस्किल ही नजर आता है ऐसे में जरुरी है की ऐसी फसल पे ध्यान दिया जाये जिसमे खर्च कम हो और लम्बे समय तक कमाइ होती रहे अनार की बागबानी एक ऐसा ही काम है और कुशी की बात ये हे की इसके लिए ज्यादा खर्च भी नही करना पड़ता

अनार की खेती से लाखो तक की कामाइ की जा सकती है अनार एक ऐसी बागबानी है एक बार पोधा लगाने के बाद कइ साल तक हम फ्रूट ले सकते है अनार को सबसे ज्यादा पोसक तत्वों से भरपूर और स्वास्थ वर्धक माना गया है साथ ही इस से अछि आमदनी भी हो जाती है अगर आप भी अनार का बाग लगाना चाहते है तो सुरु से ही कुछ बातो का ध्यान रखे कइ बार किसान बाग तो लगा देते है और जानकारी के आभाव से उनको नुकसान भी उठाना पड़ सकता है इस प्रकार के नुकसान से बचने के लिए कुछ बातो पे विसेस ध्यान देना चाहिए , चलिए जानते है कुछ महतव पूर्ण बाते

अनार का फल सेहत के लिए काफी लाभदायक होता है अनार में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट फाइबर विटामिन एंटीऑक्सीडेंट और खनिज पाया जाता है खून की कमी और कब्ज की शिकायत दूर करता है और उसके छिलके से भी आयुर्वेदिक औषधि तैयार की जाती है भारत में अनार का स्वाद और पौष्टिकता दोनों बहुत लोकप्रिय हैं। आकर्षक रंग और मधुर स्वाद के कारण अनार बहुत लोकप्रिय है। हम इस लेख में विभिन्न अनार की किस्मों के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे

अनार की बम्पर पदावर देने वाली किस्मे

  • गणेश

गणेश अनार की किस्म का विकास 1936 में अलान डी से किया गया तथा 1970 में इसका नाम गणेश रखा गया| इस किस्म के फलों का आकार मध्यम (200 से 300 ग्राम वजन) होता है| बीज कोमल, हल्के गुलाबी, रसदार, मीठे और खाने में स्वादिष्ट होते है| महाराष्ट्र में इस किस्म ने अनार की खेती में नई क्रांति ला दी है| औसत पैदावार 8 से 12 किलोग्राम फल प्रति पौधा प्राप्त होते है

  • भगवा

भगवा- इस किस्म के फल कम फटने वाले, वजन में 250 से 300 ग्राम के बहुत आकर्षक, केसरी रंग के तथा चमकदार होते हैं| बीज गोल, आकर्षक लाल रंग के, नरम तथा मीठे होते हैं| बाजार में इस किस्म को अच्छे भाव मिलते हैं| यह अनार की किस्म निर्यात के लिए उपयुक्त है| इस किस्म के फल मैं धब्बे कम दिखे जाएंगे और अनार की अन्य किस्मों के फलों की तुलना में जल्दी फल खराब नहीं होते

  • मृदुला

मृदुला- यह अनार की अच्छी उपज देने वाली संकर किस्म है| जो गणेश और गुलसा रोज के क्रास से तैयार की गई है| इसके फल का औसत वजन 250 से 300 ग्राम होता है| दाने गहरे लाल रंग के होते हैं|

  • रूबी

रूबी- इसके फल छोटे या मध्यम आकार (225 से 250 ग्राम वजन) व पतले छिलके वाले होते हैं| दाने स्वादिष्ट, मीठे, मुलायम और लाल होते हैं|

  • ज्योति

ज्योति- इस अनार की किस्म के फल मध्यम आकार के लाल रंग के होते हैं| बीज लाल और बीज मुलायम होते हैं| इसकी पैदावार क्षमता 18,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पाई गई है|

  • आरक्ता

आरक्ता- इस अनार की किस्म का फल आकार में बड़ा, मुलायम बीज, सुदृढ़ लाल दाने के साथ साथ मीठा भी होता है| यह किस्म बेहतर प्रबंधन के मामले में उच्च पैदावार (30 से 35 किलोग्राम प्रति पौधा) देती है| फल 120 से 135 दिनों के भीतर तैयार हो जाते हैं, यह अगेती किस्म है|

  • जालौर सीडलैस

जालौर सीडलैस- इस अनार की किस्म के फलों की तुड़ाई पुष्पन के 138 से 143 दिनों बाद कर सकते है| फल बड़े (200 ग्राम वजन) बहुत ही आकर्षक, छिलके का रंग गुलाबी से लाल होता है और बीज अत्यंत ही मुलायम व रसीले होते है| शुष्क क्षेत्रों की लोकप्रिय किस्म है|

  • सुपर भगवा

सुपर भगवा किस्म के फल भगवा रंग और चिकने चमकदार और बड़े आकार के होते हैं यह अनार की किस्म महात्मा फूले कृषि विधापीठ, राहुरी (महाराष्ट्र) से विकसित की गई है| इस किस्म के फल बड़े आकर (400-420 ग्राम) के लाल रंग युक्त होते है| इस किस्म के फलो को पक कर तैयार होने का समय 180-190 दिन व् औसत पैदावार 30-40 किलो फल प्रति पौधा है| सुपर भगवा यह किस्म भगवा किस्म से ही चयनित है| इसका फल भगवा से मध्यम आकार (271-299 ग्राम ) का होता है प्रति पेड़ औसत फलो की संख्या 84 प्राप्त होती है| इसके फल भगवा से 10-15 दिन पहले प्राप्त है जाते है | फल पकने की अवधि 165-175 दिन होती है|

  • जोधपुर रेड

जोधपुर रेड- इस अनार की किस्म का पौधा बड़ा होता है| फल का रंग पीलापन लिए गुलाबी रंग का होता है| फल बहुत मुलायम होता है और इसमें फल फटने की समस्या बहुत ही कम होती है| इसके फलों में लगभग 66 प्रतिशत तक रस होता है| यह भी उत्तर-पश्चिम की प्रचलित किस्म है|

अनार की बागवानी लगाने का सही समय

अनार की बागवानी लगाने का सही समय अगस्त से सितंबर और फरवरी से मार्च का महीना अनार के नए पौधे लगाने का सबसे सही समय होता है पोध रोपण के 3 साल बाद फ्रूट आने लगते हैं लेकिन व्यवसायिक रूप से उत्पादन लेने के लिए 5 वर्ष के बाद ही फल लेना चाहिए अच्छी तरह से विकसित पौधा 60 से 80 फल प्रति वर्ष देता है और पोधा 25 से 30 वर्षो तक फल देता है

सघन विधि से बाग लगाने से लगभग 400 टन उपज हो सकती है जिससे एक हेक्टर से 5 से 8 लाख सालाना आय प्राप्त हो सकती है

जमीन और गढ़ों की तयारी

अनार के बाग तैयार करने के लिए खेत में गहरी जुताई करें और धूप में अच्छे से तप ने दे और जमीन को जूताइ करके समतल बना ले

गढो का आकर लंबाई-60 से .मी , चोढाइ -60 से.मी , गहराइ -60 से.मी

गढ़ों की भराइ : कंपोस्ट खाद-20 किग्रा , वर्मी कंपोस्ट -2 किग्रा, नीम केक-1 किग्रा, सुपर फास्फेट 1 किग्रा और 50 ग्राम क्लोरो पायरीफास चूर्ण मिट्टी में मिला कर गड्ढों को सतह 15 से मी ऊंचाई तक भर दे गड्ढे भरने के बाद सिंचाई करें ताकि मिट्टी अच्छी तरह से जम जाए के बाद ही पौधारोपण करें ,पौधरोपण के लिए खेत की तैयारी मई जून माह में सामान्य रूप से करें

अनार की बागवानी :– शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण बाग़वानी फसल है| शुष्क एवं अर्धशुष्क जलवायु क्षेत्र जहाँ औसत वर्षा 18-55 (सेंटीमीटर) होती है, अनार बगीचे लगाने के लिए उपयुक्त रहती है| अनार के पौधों में सूखा सहन करने की अत्यधिक क्षमता होती है, परन्तु फल के विकास के समय नमी आवश्यक होती है| फलो के विकास में रात के समय ठंडक तथा दिन में शुष्क व् गर्म जलवायु काफी सहायक होती है| अनार के बगीचे की स्थापना के लिए जल व गहरी दोमट भूमि जिसका पी. एच. मान 8.5 से कम हो उपयुक्त रहती है| अनार को 6 ई सी तक लवणीयता वाली भूमि सहनीय है|

अनार की रोपण की दूरी और पौधों की संख्या

आमतौर पर क्यारी से क्यारी 5 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर तक रखनी चाहिए एक हेक्टर में 667 पौधे लगाए जाते हैं सघन विधि से बाग लगाने से पैदावार डेढ़ गुना तक बढ़ शक्ति है

अनार के खेती के लिए जलवायु

अनार सब ट्रॉपिकल जलवायु का पौधा है सुख जलवायु में अच्छी तरह उगाया जा सकता है फलों के विकास और पकने के समय गर्म और सुख जलवायु की जरूरत होती है अनार के फल के विकास के लिए 38 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत पड़ती है

अनार में सिंचाई व्यवस्था

अनार के बागों में अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है जब हम पौधे लगाते हैं उस समय बारिश का सीजन होता है उसकी वजह से पौधों को सही पोषण मिल जाता है लेकिन कम बारिश होने पर 10 से 12 दिन के अंतराल पर सिंचाई कर लेना चाहिए अनार के बागों के लिए टपक सिंचाई विधि सबसे अच्छी मानी जाती है टपक सिंचाई विधि से पानी की बचत होती है और उपज में बढ़ोतरी भी होती है

अनार की खेती के लिए मिट्टी कैसी होनी चाहिए

अनार के पौधे को सभी तरह की मिट्टी अनुकूल हो जाती है दोमट मिट्टी या हल्की मिट्टी में फल अच्छे गुणवत्ता वाले फल प्राप्त किए जा शकते हैं अनार की खेती के लिए पीएच मान 6. 5 से 7.5 वाली मिट्टी में अनार की अच्छी उपज मिलती है अनार की खेती करने के लिए जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है फलों की गुणवत्ता और रंग हल्की मिट्टी में अच्छी होती है

अनार का फल कितने दिनों में तयार होता है

अनार के पेड़ पर फल सेट होने के बाद फल तैयार होने में और पकने में 5 से 7 महीना अलग जाता है सामान्यतः अनार का फल 130 से 150 दिनों के बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाता है

अनार के पौधों मैं खाद और उर्वरक की सही मात्रा और समय

1 .पहले साल प्रति पौधा (1) नाइट्रोजन 125 ग्राम(२) फॉस्फोरस 125 ग्राम (3) पोटेशियम 125 ग्राम दे

2. दूसरे साल प्रति पौधा (1)नाइट्रोजन 225 ग्राम(2)फॉस्फोरस250 ग्राम (3)पोटेशियम 250 ग्राम दे

3. और तीसरे साल (1)नाइट्रोजन 350 ग्राम (२)फास्फोरस 250ग्राम (3)पोटेशियम 250ग्राम

4. चोथे साल (1)नाइट्रोजन 450 ग्राम (२)फास्फोरस 250ग्राम (3)पोटेशियम 250ग्राम

5. और पांचवे के साल बाद 10 से 15 किलो सडी हुइ गोबर की खाद और (1)नाइट्रोजन 600 ग्राम (२)फास्फोरस 250ग्राम (3)पोटेशियम 250ग्राम प्रति पोधा डालना चाहिए

अनार के पेढो की कटाई

अनार के पोधे में 2 या 3 तने रखने के बाद दूसरे तने को काट दिया जाता है इस तरह तने की कटाई करने से पौधे को प्रकाश और हवा अछि तरह मिलता है उसकी वजह से पौधों की बढ़वार भी अच्छी तरह होती है फल और फूल अच्छी तरह आते हैं यह विधि ज्यादा उपयुक्त है

अनार के पौधे में होने वाले रोग

1 Bacterial leaf and fruit spot

  • लक्षण:
  • फलों पर छोटे-छोटे लाल भूरे गोलाकार धब्बे दिखाई देते हैं।
  • जैसे-जैसे रोग बढ़ता है ये धब्बे आपस में जुड़कर बड़े धब्बे बना लेते हैं और फल सड़ने लगते हैं।
  • फल प्रभावित होते हैं जो पीले पड़ जाते हैं और खाने के लिए अयोग्य हो जाते हैं।
  • प्रबंध:
  • सभी रोग ग्रसित फलों को इखटा कर फेक् देना चाहिए।
  • रसायन:
  • मैंकोजेब (0.25%) या कैप्टाफ (0.25%) का छिड़काव करने से रोग पर प्रभावी नियंत्रण होता है।
  • 2 एन्थ्रेक्नोज: कोलेटोट्राइकम ग्लियोस्पोरियोइड्स
  • लक्षण:काले पत्तों के धब्बे के साथ दिखाई देते हैं।
  • पीली पत्तियाँ गिरने लगती हैं। फूल भी इसके लक्षण दिखाते हैं।
  • कोमल और परिपक्व दोनों फलों पर धब्बे होते हैं, जो शुरू में गोलाकार होते हैं, लेकिन बाद में अनियमित, भूरे से गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं,
  • रोगग्रस्त क्षेत्र पर छोटे, काले बिंदु एसरवुल्ली को दर्शाते हैं।
  • अगस्त से सितंबर के दौरान उच्च आर्द्रता और 20-27oC के तापमान में यह रोग गंभीर होता है।
  • यह आम, अमरूद और पपीता में भी फैलता है।
  • प्रबंध:
  • रसायन:
  • कार्बेन्डाजिम/डाइफेनकोनाजोल या थियोफैनेट मिथाइल 0.25 मिलीलीटर/लीटर का छिड़काव प्रभावी पाया गया है।
  • डिफेनकोनाज़ोल 25 ईसी 1.0 मिली/लीटर या प्रोक्लोरेज़ 45 ईसी 0.75 मिली/लीटर का छिड़काव एंथ्रेक्नोज रोग मैं असरकारक है

20 दिनों के अंतराल पर कवकनाशी का छिड़काव, जैसे हेक्साकोनाज़ोल 1 मिली/लीटर, थायोफैनेट मिथाइल 1 मिली/लीटर या कार्बेन्डाजिम 1 मिली/लीटर, काफी प्रभावी है। क्लोरोथालोनिल (2 ग्राम/लीटर) और मैनकोज़ेब (2 ग्राम/लीटर) दोनों संपर्क फफूंदनाशकों में अधिक प्रभावी हे

बैक्टीरियल ब्लाइट : ज़ैंथोमोनस एक्सोनोपोडिस पी.वी. पुनिका के लक्षणों में शामिल हैं:

  • पत्तियों पर एक से अधिक छोटे पानी से लथपथ, गहरे रंग के अनियमित धब्बों का दिखना, जो कभी भी समय से पहले पत्तियां गिर जाती है
  • रोगज़नक़ तने और शाखाओं को भी संक्रमित करता है,
  • फलों पर गहरे भूरे रंग के अनियमित, थोड़े उभरे हुए, तैलीय धब्बे देते हैं , जो कभी-कभी एल-आकार की दरारों के साथ खुल जाते हैं।
  • ताजा रोपण के लिए रोगमुक्त पौध का चयन
  • प्रभावित शाखाओं, फलों की नियमित रूप से छँटाई करें और जलाएँ
  • फल तोड़ने के बाद कम से कम चार महीने का आराम दें
  • रसायन:
  • छंटाई से पहले इस पर 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए
  • इथ्रेल छिड़काव या पत्ते गिरने के बाद, 0.5 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट + 2.5 ग्राम कॉपर ऑक्सी क्लोराइड + 200 ग्राम लाल ऑक्साइड प्रति लीटर पानी के साथ पेस्ट या स्मीयर करें।
  • प्रति लीटर पानी में 0.5 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट या बैक्टिरिनशाक +2.5 ग्राम कॉपर ऑक्सी क्लोराइड का छिड़काव करें।
  • अगले दिन या किसी अन्य दिन 1 ग्राम ZnSo4 +1 ग्राम MgSo4 +1 ग्राम बोरोन +1 ग्राम CaSo4 प्रति लीटर पानी के साथ स्प्रे करें।
  • 4. Cercospora fruit spot:

    लक्षण:
    पत्तियों एवं फलों पर हल्के आंचलिक भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। टहनियों पर काले एवं अण्डाकार धब्बे दिखाई देते हैं।
    टहनियों में प्रभावित क्षेत्र उभरे हुए किनारे के साथ चपटा और दबा हुआ हो जाता है।
    ऐसी संक्रमित टहनियाँ सूख जाती हैं। गंभीर मामलों में पूरा पौधा मर जाता है।
    इनोकुलम का द्वितीयक स्रोत पवन जनित कोनिडिया है। सितंबर से नवंबर के दौरान यह बीमारी गंभीर होती है।
    Management:
    रोगग्रस्त फलों को नष्ट कर देना चाहिए.
    रोगग्रस्त टहनियों की छँटाई कर देनि चाहिए
  • रसायन: फसल पर हेक्साकोनाज़ोल 5 ईसी या प्रोपिकोनाज़ोल 25 ईसी या डिफेनकोनाज़ोल 25 ईसी @ 1 मिली/लीटर का छिड़काव करें।
    किटाज़िन 48 ईसी 2 मिली/लीटर या कार्बेन्डाजिम (1 ग्राम) या क्लोरोथालोनिल 75 डब्लूपी (2.5 ग्राम) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 डब्लूपी (3 ग्राम) प्रति लीटर।
    थियोफैनेट मिथाइल/कार्बेन्डाजिम @ 1 ग्राम/लीटर सबसे प्रभावी थे।

5. सर्कोस्पोरा पत्ती धब्बा: सर्कोस्पोरा पुनिका

  • लक्षण:
  • पत्ती के धब्बे छोटे, पीले आभामंडल वाले भूरे रंग के होते हैं।
    धब्बे बिखरे हुए, गोलाकार या अनियमित होते हैं और उम्र के साथ गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं।
    निचले हिस्से पर धब्बे बीजाणु धारण करने वाली संरचनाओं के समूहों के साथ धँसे हुए हैं, इसलिए उनका रंग भूरा है।
    फूल के बाह्यदलों पर छोटे, गोलाकार, काले धब्बे दिखाई देते हैं।
    फलों के छिलके पर धब्बे काले, छोटे और गोलाकार होते हैं।
    बूढ़े होने पर फल बड़े, अनियमित गोलाकार और उदास हो जाते हैं जिससे फल बदसूरत दिखने लगते हैं।
    प्रबंध:
    रसायन:

    प्रभावी नियंत्रण के लिए थायोफैनेट – मिथाइल @ 1 ग्राम/लीटर, कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम/लीटर, हेक्साकोनाज़ोल 1 मिली/लीटर या प्रोपिकोनाज़ोल 1 मिली/लीटर का छिड़काव करें
  • 6. अनार का मुरझाना: सेराटोसिस्टिस फिम्ब्रिएटा, फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम
  • लक्षण:
  • प्रभावित पौधों की कुछ टहनियों या शाखाओं में पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं, जिसके बाद पत्तियाँ झड़ने लगती हैं और सूखने लगती हैं। कुछ महीनों या एक वर्ष में पूरा पेड़ नष्ट हो जाता है।
  • जब प्रभावित पेड़ को लंबाई में या क्रॉस-सेक्शन में काटा जाता है, तो लकड़ी का गहरा भूरा-भूरा रंग दिखाई देता है।
  • इनोकुलम का प्राथमिक स्रोत मिट्टी है और इनोकुलम का द्वितीयक स्रोत कोनिडिया, पानी है। रोग भारी मिट्टी में अधिक होता है तथा मिट्टी की नमी के साथ बढ़ता है।
  • प्रबंध:
  • पानी जमा न होने दें, जल निकासी की सुविधा बनाने का प्रयास करें।
  • भीगने के बाद 2-3 दिन तक सिंचाई न करें।
  • रसायन:
  • प्रारंभिक अवस्था में 2 मिलीलीटर प्रोपीकोनाज़ोल + 4 मिलीलीटर क्लोरोपाइरीफॉस प्रति लीटर पानी के घोल से, प्रति पेड़ 8-10 लीटर घोल से छिड़कें।
  • यदि कोई पौधा पहले से ही मुरझा गया है तो ऊपर बताए अनुसार रसायन छिड़कें, फिर पूरे पौधे को जड़ सहित हटा दें और जला दें।
  • 25 मिली/लीटर की दर से फॉर्मेल्डिहाइड से सराबोर करें।

कीट-पतंगों की पहचान

  • 1. अनार तितली/अनार फल छेदक
  • Biology:
  • अंडे: कोमल पत्तियों, डंठलों और फूलों की कलियों पर अकेले रखे जाते हैं।
  • लार्वा – छाल भूरी, छोटी और मोटी, छोटे बालों से ढकी हुई, लार्वा अवधि 18-47 दिनों तक रहती है।
  • प्यूपेशन: यह या तो क्षतिग्रस्त फलों के अंदर या उसे पकड़े हुए डंठल पर होता है।
  • प्यूपल अवधि 7-34 दिनों तक रहती है। कुल जीवन चक्र 1 से 2 महीने में पूरा होता है।
  • वयस्क – नीली भूरी तितली।
  • क्षति के लक्षण:
  • · कैटरपिलर छोटे फलों में छेद करती है।
  • · आंतरिक सामग्री (गूदा और बीज) पर फ़ीड
  • · फल सड़ने और गिरने की समस्या हो सकती है
  • फल पर छेद हो जाते हैं फल सड़ जाते हैं और गिर जाते हैं
  • अनुकूल परिस्थितियाँ:
  • · यह अधिकतर ‘मृग’ बहार के दौरान प्रचलित है।
  • · फल की चोट 30-50 दिन की उम्र में सामने आई।
  • 2. तना छेदक
  • Biology:
  • अंडा: अंडे युवा जीवित पौधों में तनों में दिए जाते हैं और छाल के नीचे जमा हो जाते हैं। अंडों की संख्या
  • मादा द्वारा रखी गई 20-40 है
  • ग्रब: नया उभरा हुआ लार्वा लगभग 1/4 इंच लंबा होता है, परिपक्व लार्वा लगभग 2.1/2 इंच लंबा होता है। पर
  • अंडे से निकलने वाला लार्वा अंडनिक्षेप गुहा के आसपास के मुलायम ऊतकों को खाता है और फिर तने में घुस जाता है
  • और जड़ें. लार्वा अवधि की अवधि लगभग नौ या दस महीने होती है।
  • प्यूपल: अवधि 16 से 18 दिन की होती है। प्रति वर्ष केवल एक पीढ़ी होती है और भृंगों की दीर्घायु 45 से 45 तक होती है
  • 60 दिन.
  • वयस्क: हल्का पीला-भूरा शरीर, हल्के भूरे एलीट्रा के साथ और 30 से 35 मिमी लंबे होते हैं। भृंग उभर आता है
  • छाल के माध्यम से एक गोलाकार छेद खाने से। वयस्क भृंग 1.1/4 से 1.1/2 इंच लंबे, सुस्त, पीले-भूरे, शरीर के किनारे और पैर नीले, एलीट्रा पीले-भूरे रंग के और बड़ी संख्या में काले धब्बों वाले होते हैं
  • पिन के सिरे से लेकर छोटे-छोटे धब्बों तक का आकार अलग-अलग होता है।
  • क्षति के लक्षण:
  • · ग्रब तने के अंदर घुस जाते हैं और सैपवुड को खाते हैं।
  • · वयस्क भृंग दिन भर सक्रिय रहते हैं और टहनियों की हरी छाल को कुतरकर खाते हैं।
  • · मुख्य तने की छाल पर छेद, मलमूत्र और सूखी चूर्ण सामग्री आमतौर पर आधार के पास देखी जाती है
  • पौधे।
  • 3. सफ़ेद मक्खी
  • Biology:
  • · अंडे: अंडे पत्तियों के नीचे एक घेरे में दिए जाते हैं।
  • · अप्सरा: शरीर के किनारों पर मोम की छोटी कांच जैसी छड़ें
  • · वयस्क: पाउडर जैसा सफेद, सुबह के समय सक्रिय।
  • · क्षति के लक्षण:
  • · हनी ओस – कालिखयुक्त फफूंद का विकास
  • · पत्तियों का पीला पड़ना।
  • · प्रभावित पत्तियों का गिरना।
  • 4. शॉट होल बोरर
  • Biology:
  • · अंडे अंडाकार या गोल, चमकदार और इंद्रधनुषी सफेद होते हैं।
  • · लार्वा सफेद और बिना पैरों के होते हैं, और 4 मिमी तक लंबे हो सकते हैं।
  • · वयस्क लगभग 2-3 मिमी लंबा, काला से लाल-भूरा और सिगार के आकार का होता है। उनके पास एक छोटा, ठूंठ है
  • सिर का कैप्सूल, चबाने वाले मुखभाग के साथ। नर वयस्क नहीं उड़ते. प्रति वर्ष दो पीढ़ियाँ।
  • क्षति के लक्षण:
  • · वयस्क मादाएं तने और जड़ों के आधारीय भाग में छेद कर देती हैं।
  • जड़ों, मुख्य तने पर छोटे-छोटे छेद हो जाते हैं, मुरझा जाते हैं और अंततः पेड़ की मृत्यु हो जाती है।
  • अनुकूल परिस्थितियाँ:
  • · वे -26 से 15°C तक के तापमान में जीवित रहते हैं। उड़ान गतिविधि देर दोपहर में सबसे अधिक होती है
  • या शाम को जल्दी और भृंग आमतौर पर 15 फीट या उससे नीचे उड़ते हैं।
  • 5. थ्रिप्स
  • Biology:
  • · वयस्क सूक्ष्म, पतले, मुलायम शरीर वाले कीड़े होते हैं जिनके पंख भारी झालर वाले, काले भूरे रंग के होते हैं।
  • पीले पंख और 1.4 मिमी लंबे। स्किरटोथ्रिप्स डॉर्सालिस वयस्क भूरे पीले रंग का होता है।
  • · मादा पत्तियों की निचली सतह पर औसतन 50 गंदे सफेद सेम के आकार के अंडे देती है।
  • · ऊष्मायन अवधि 3-8 दिन है। नवजात शिशु लाल रंग के होते हैं और पीले-भूरे रंग के हो जाते हैं
  • वो बढ़ते हैं।
  • · प्यूपल अवधि 2-5 दिनों तक रहती है
  • क्षति के लक्षण:
  • · शिशु और वयस्क दोनों ही पत्तियों की निचली सतह को कुरेदकर और चूसकर खाते हैं।
  • रिसता हुआ कोशिका-रस।
  • · पत्ती की नोक भूरी हो जाती है और मुड़ जाती है, सूख जाती है और फूल झड़ जाते हैं और फलों पर पपड़ी बन जाती है
  • बाजार मूल्य कम करें.
  • अनुकूल स्थिति:
  • · इस कीट का प्रकोप मुख्य रूप से जुलाई से अक्टूबर के बीच देखा जाता है और इसका चरम समय सितंबर में होता है
  • 6. पूँछ वाला मीली बग
  • Biology:
  • · मादा समूहों में अंडे देती है जो शरीर के नीचे मोमी रेशों की ढीली ओविसैक में होते हैं।
  • · उर्वरता (अंडे की संख्या) प्रति पीढ़ी 109 से 185 तक होती है।
  • · डिंबोत्सर्जन की अवधि 20-29 दिनों तक चली।
  • · ऊष्मायन अवधि लगभग 3-4 घंटे तक चली
  • मादा और नर अप्सराएँ क्रमशः 3 और 4 बार पिघलीं, और विकास की अवधि अलग-अलग रही
  • क्रमशः 26-47 और 31-57 दिनों तक।
  • · वयस्क मादा की दीर्घायु 36-53 दिन और नर की 1-3 दिन होती है।
  • 7. एफिड
  • Biology:
  • अंडे: अंडे एक या दो दिन बाद फूटते हैं। युवा एफिड्स, जिन्हें निम्फ कहा जाता है।
  • अप्सरा: अंडाकार या थोड़ा लम्बा, छह खंडों वाले एंटीना के साथ लाल भूरे रंग का
  • वयस्क: छोटे पीले हरे रंग आमतौर पर अनार की परिपक्व पत्तियों के ऊपरी किनारों पर बसते हैं,
  • मध्यशिराओं के साथ और पत्ती के किनारों के आसपास केंद्रित; यह फूलों पर भी पाया जाता है और, शायद ही कभी, फलों पर भी।
  • एफिड्स दो तरह से प्रजनन करते हैं: अंडे देकर और जीवित बच्चे पैदा करके, यह इस पर निर्भर करता है कि जन्म प्रक्रिया क्या है
  • पर्यावरण की स्थिति और भोजन की उपलब्धता। जब भोजन प्रचुर मात्रा में होता है, तो एफिड्स युवा को जन्म देते हैं
  • जनसंख्या तेजी से विकसित होती है क्योंकि इस कीट के कई बच्चे होते ह

लागत और आमदनी

अनार के बाग को लगाने के बाद पौधा 3 से 4 साल के बाद फल देना स्टार्ट कर देता है अनार के एक ही पेड़ से करीब 60से 80 फल उपज मिल जाती है और जैविक खाद और उर्वरक का इस्तेमाल कर हर साल लागत में 20 % तक पैसा बचा सकते हैं जैविक विधि का उपयोग बाग में करने से कीटनाशक दवाई का खर्च बच जाता है अनार एक ऐसा फल है जो कम पानी वाले इलाकों में भी आसानी से उगाया जा सकता है किसान कम लागत से भी अनार की खेती से अधिक मुनाफा कमा सकता है सघन विधि से बाग लगाने से लगभग 400 टन उपज हो सकती है जिससे एक हेक्टर से 5 से 8 लाख सालाना आय प्राप्त हो सकती है

अनार के फायदे


अनार को सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है इसमें विटामिन C, विटामिन के कई स्रोत, एंटीऑक्सिडेंट्स और फाइबर बहुत हैं। यहां कुछ अनार के लाभ दिए गए हैं

1. अच्छी पाचन शक्ति
 अनार में पाया जाने वाला फाइबर पाचन क्षमता को बढ़ाता है। इससे पाचन क्रिया स्वस्थ रहती है और कब्ज कम होता है।

2. दिल के लिए फायदेमंद
 अनार में विटामिन C और एंटीऑक्सिडेंट्स दिल के लिए अच्छे हैं। इससे रक्तचाप नियंत्रित होता है और हृदय स्वस्थ रहता है।

3. त्वचा के लिए लाभदायक
अनार में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं और झुर्रियों को कम करते है

4. इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाएं 
अनार में मौजूद विटामिन C इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है, जिससे रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है

निष्कर्ष: अंत में यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि किसान भाइयों यह बागवानी कर कमा सकते हैं लाखों रुपए इस लेख में मैंने आपको अनार की बागबानी कैसे करे इसकी जानकारी दी है. मुझे उम्मीद है  आपको मेरा यह लेख पढ़कर  समझ आ गया होगा अनार की बागबानी कैसे करे इसी प्रकार के लेख पढने के लिए मेरे ब्लॉग myknowledgeinfo को विजिट करते रहें. मेरा यह लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद |

2 thoughts on “Pomegranate Farming /किसान यह बागवानी कर कमा सकते हैं लाखों रुपए”

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